एक साल बाद, वही कंपनी जिसने उसे नौकरी से ठुकराया था, अब उसे "टेक्निकल सुपरवाइजर" के पद पर ले गई। बाबूराम अब पुराने बुनकरों को नई मशीनें सिखाता।
बाबूराम ने सीखना शुरू किया। उसकी उँगलियाँ, जो कभी रेशम संवारती थीं, अब कीबोर्ड पर चलने लगीं। उसने सीखा कि ऑटो-लूम को कैसे सेट करना है, कैसे डिज़ाइन अपलोड करने हैं। structural unemployment in hindi
कहानी का सीख:
कुछ महीनों बाद, सरकार ने एक स्किल डेवलपमेंट सेंटर खोला। वहाँ कंप्यूटर थे, मॉडर्न मशीनें थीं। पहले बाबूराम ने कहा, "मैं बूढ़ा हो गया हूँ सीखने के लिए।" एक साल बाद
। यह वो बेरोज़गारी है जो तब होती है जब बाजार की मांग बदल जाती है, टेक्नोलॉजी बदल जाती है, लेकिन लोगों के कौशल नहीं बदल पाते। नौकरियाँ हैं, पर उन नौकरियों के लिए लोगों के पास सही स्किल नहीं है। टेक्नोलॉजी बदल जाती है
बाबूराम हँसा, "पर भाई, मेरे कपड़े में जान है। उसकी बुनावट में मेरी आत्मा बसती है।"
कंपनी वालों ने कहा, "हमें तो ऑपरेटर चाहिए। जो बटन दबा सके, स्क्रीन पढ़ सके। तुम्हारा हुनर हमारे काम का नहीं।"